सुप्रीम कोर्ट अपना रुतबा और विश्वसनीयता खो चुका है ..!??

चीज़ें जैसी दिख रही हैं, वैसी वे हैं नहीं ।                         जो सुनाया जा रहा है, उससे कहीं अधिक वो गूँज रहा है जो कहा नहीं गया है ।

किसान संबंधी कृषि क़ानूनों पर मध्यस्थता करने के लिए समिति की घोषणा के पहले तक सर्वोच्च न्यायालय में जो कुछ चल रहा था, उसे देखते हुए बस यही ख्याल आ रहा था, लेकिन समिति के नामों के ऐलान के बाद जो झीना-सा पर्दा था, वह भी हट गया । अब तस्वीर धुंधली नहीं रही , अब आप खुली आँखों से सारा खेल देख सकते हैं ।

देश के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की पीठ से जो सरकार के ख़िलाफ़ गर्जन-तर्जन हो रहा था, उसे फटकार सुनाई जा रही थी, उसका खोखलापन तुरंत उजागर हो गया। पूरी सुनवाई किसानों के हित, देश की भलाई का एक निहायत ही कमज़ोर स्वाँग भर ही थी। जिसकी पटकथा बेहद लचर थी, और अभिनय हद दर्जे का कमज़ोर । ये ऐसा था जैसे आप कोई फ़िल्म देख रहे हों और आपको उसका अंत पहले से ही पता हो ।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने लंबे समय से आंदोलन कर रहे किसानों और हठधर्मी सरकार के बीच मध्यस्थता के लिए वैसे नाम चुने जो खुद शुरू से ही इन क़ानूनों के पैरोकार रहे हैं, और ख़ुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी मानते हैं । ऐसा करते ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय के प्रति आम जनता और किसानों का जो थोड़ा बहुत भरोसा बचा हुआ था, उसने वो भी गँवा दिया । अब होगा …यह समिति दफ्तर खोलकर बैठी रहेगी, और कोई किसान उसकी चौखट पर भी नहीं फटकेगा । इस तरह ये समिति की भी बेइज्जती होगी । जैसे कभी हुआ करता था , कि ऐसी समितियों में नाम आना सम्मान और प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता था । लेकिन मौजूदा समय में आप इस तरह की कल्पना भी नहीं कर सकते ।

जब अदालती कार्रवाई शुरू हुई और माननीय अदालत ने सरकार के कान खींचने शुरू किए, तो एक बिगड़ैल-दुलारे बच्चे की तरह सरकार ठुनकने लगी कि इतनी जोर से नहीं, दर्द हो रहा है ! तो भी कुछ भोले-भाले और लिहाजी स्वभावी लोगों ने कहा कि जम्मू और कश्मीर, बाबरी मस्जिद, सीएए और घर लौटते मज़दूरों के मामलों के मुक़ाबले अदालत कुछ तो बदली दिख रही है ।

लेकिन जैसे ही अदालत ने कहा कि सरकार के बस की बात नहीं, हम एक समिति बनाएँगे, तो पी साईनाथ जैसे शक्की लोगों ने कहा समिति के हाथों मौत स्वीकार नहीं होगी । अंग्रेज़ी ज़्यादा चुस्त है: डेथ बाई कमिटी कबूल नहीं।
  • फिर किसानों ने पूरी कार्रवाई को देखा तो कहा – हमारी भलाई सोचने के लिए बहुत शुक्रिया,आभार ! लेकिन आपने समिति का जो ये जाल बिछाया है, और आप चाहते हैं कि हम उस पर बैठें , तो हमारा जवाब ना है, हम उस पर नहीं बैठना चाहते । हम तो बस एक सीधा सा वाक्य कह रहे हैं कि सरकार ये तीनों क़ानून वापस ले ले । सरकार जो जबरदस्ती हमारा भला करने पर आमादा है, वो हमें हमारे हाल पर छोड़ दे । 
सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन की एक तस्वीर ।

जिनकी संस्थाओं पर श्रद्धा है, (जो कि जनतंत्र को बचाए रखने के लिए अनिवार्य है) उन्हें धक्का लगा है , वे इस बात का अफ़सोस कर रहे हैं, कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपनी साख खो दी । लेकिन ये अफ़सोस आज क्यों ? जिस अदालत ने ‘एनआरसी’ की प्रक्रिया को सरपट दौड़ाने के लिए चाबुक तक चलाने से परहेज नहीं किया , और आज भी लाखों असहाय आमजन उसकी क़ीमत चुका रहे हैं ! नागरिकता को धर्म के आधार पर वर्गों में बांटा जा रहा था, जिस सर्वोच्च अदालत ने सार्वजनिक तौर पर ये कबूल करके कि ‘बाबरी मस्जिद’ को शहीद एक आपराधिक षड्यंत्र के तहत किया गया था, लेकिन फिर भी सर्वोच्च अदालत द्वारा घोषित विध्वंसकारियों को ही उस विवादास्पद भूमि खंड का जहां ‘मस्जिद’ हुआ करती थी को ‘मंदिर’ निर्माण करने के लिए मालिकाना हक दे दिया , जो सर्वोच्च अदालत ‘सीएए'(नागरिकता संशोधन कानून) की ‘संवैधानिकता’ को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर ही कुण्डली मार कर बैठ गई, और जनहित याचिका पर ये कहकर सुनवाई करने से पल्ला झाड़ लिया कि “जब तक आंदोलन समाप्त नहीं हो जाता अदालत सुनवाई नहीं करेगी” जिस सर्वोच्च अदालत ने जम्मू कश्मीर को तोड़ दिए जाने के बाद दायर किए गए बंदियों की प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को देखने भर की जरूरत नहीं समझी, वही अदालत अगर इस मसले में भी अपनी पूर्वस्थापित लीक से हट जाती.. तो मुसलमानों, कश्मीरियों, प्रवासी मज़दूरों, संदिग्ध नागरिक या विदेशी घोषित कर दिए गए असमवासियों को लगता कि उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया गया है ! उनकी धारणा बदल जाती कि इस देश में सभी को बराबरी का हक नहीं है, यहां सिर्फ कुछ को इन्साफ़ मिलता है, जबकि बाकियों के लिए उसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती ।

अदालत ने अपने इस फ़ैसले से इस ग़लतफहमी को जड़ पकड़ने का मौक़ा नहीं दिया । नाइंसाफ़ी के मामले में वह सबको एक निगाह से देखती है । कम से कम इस एक बात के लिए तो उसका शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए । अपने पिछले बर्ताव के संधर्भ में ही ख़ुद को रखकर उसने न्याय के विचार में कोई भ्रम नहीं पैदा होने दिया है । एक न्याय है और दूसरा अन्याय, दोनों के बीच फर्क बना हुआ है।

किसानों को ठीक ही शुबहा था कि अदालत से उनके आन्दोलन को तोड़ने की कोई तरकीब हासिल की जाएगी । और उसे बदनाम करने की साज़िश पर मुहर भी लगे शायद ।

अदालत ने जब कहा कि वो इस विरोध को रोकने के लिए नहीं कहेगी , लेकिन यह कहाँ किया जाए, इसे लेकर वह विचार कर सकती है । उसी तरह ये भी कहा कि औरतों, बच्चों और बूढ़ों को क्यों आंदोलन में रखा गया है । इस तरह वह आन्दोलन में अपनी भूमिका की तलाश कर रही है, और ख़ुद को आंदोलन का अभिभावक घोषित कर रही है । उसने सरकार के इस इल्जाम को भी तवज्जो दी कि इस आंदोलन में प्रतिबंधित देश विरोधी संगठन सक्रिय हैं, और आंदोलन वास्तव में दूसरे इरादों से चलाया जा रहा है, इससे किसानों का कोई सरोकार नहीं है, इसे ग़ैर किसान चला रहे हैं । अदालत का महाधिवक्ता के इस आरोप पर नोटिस जारी करना ही उसे वैधता देना है । 

आन्दोलन में शामिल होने का हक सबका है , चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हों । असल मुद्दा ये क़ानून हैं । आंदोलन सरकार को गिराने का नहीं है । यह माँग किसानों की नहीं है । वैसे ही जैसे 2019 में शुरू हुए सीएए विरोधी आन्दोलन में क़ानून वापस लेने की माँग थी, सरकार के इस्तीफ़ा देने की नहीं । लेकिन उस समय भी सरकार और सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा खुले मंचों से सार्वजनिक तौर पर ये प्रचारित किया गया कि ये आंदोलन एक सम्प्रदाय के ख़िलाफ़ है, ये आंदोलन देश को तोड़ने की साजिश है, सरकार को बदनाम करने की साजिश है , उसे घुटने टेकवाने की साजिश है.. और साम्प्रदायिक आधार पर जनता को बांट कर आन्दोलनकारियों का इस नाम पर बर्बरतापूर्ण दमन किया गया ।

ठीक उसी प्रकार इस बार भी आन्दोलन शुरू होते ही “भारतीय जनता पार्टी” के नेताओं ने ही नहीं, मंत्रियों तक ने किया । किसानों को भोला-भाला बताकर कहा गया कि उन्हें माओवादी, खालिस्तानी, जिहादी, टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग बरगला रहे हैं, जिनका मकसद सरकार और देश को कमजोर करने का है, वो किसानों को सरकार के ख़िलाफ़ भड़का रहे हैं । सर्वोच्च अदालत में इस राजनीतिक आरोप को सरकार की मान्यता के रूप में पेश किया गया, जब महाधिवक्ता ने ये आरोप लगाए । अदालत ने निर्देश दिया कि सरकार खुफिया संस्थाओं की तरफ़ से इस संबंध में प्रामाणिक जानकारी दे, उनके पास क्या सबूत हैं !!

हमारी पुलिस, जाँच एजेंसियाँ और खुफिया संस्थाएँ मौजूदा समय में जिस तरह काम कर रही हैं, उसे ध्यान में रखते हुए ये उम्मीद करना कि वे सरकारी दावे से अलग कोई रिपोर्ट देंगी, ये निःसन्देह हास्यास्पद है ।

कानूनी तबक़ा अदालत के रवैये पर सर पकड़ कर बैठ गया है । उनका कहना है कि सर्वोच्च अदालत वो कर रही है जो विधायिका और कार्यपालिका का काम है । यह ख़तरनाक शुरुआत है । जनतंत्र में संस्थाओं के बीच कार्य विभाजन साफ़ है । अदालत ने क़ानूनों की संवैधानिकता पर विचार नहीं किया है, जो कि उसका काम है । यह भी एक रूपवाद है । संसद जब सत्ताधारी दल की राजनीतिक सभा में तब्दील कर दी जाए तो यह अदालत वही करेगी जो अभी कर रही है । इस तबक़े की चिंता भी वाजिब है, क्योंकि अदालती कार्रवाई जिस तरह चल रही है, उससे क़ानून के पेशे की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़ा हो जाएगा।

प्रताप भानु मेहता को अफ़सोस है कि देश की सर्वोच्चतम अदालत ने अपना वो रुतबा गँवा दिया… कि वह जनता के भरोसे की आख़िरी जगह है । सर्वोच्च अदालत की वो विश्वशनीयता आमजन के परिदृश्य में धुंधली पड़ रही है, जिसमें वो एक विश्वास से आशा की किरण की तरह आस्था रखता था, वो किरण जो उनको घोर अंधेरे में भी सत्य के उजाले का स्मरण कराती थी ! लेकिन सुनवाई के बाद शायद अदालत को इत्मीनान हो कि जनता के भरोसे का तो जो हो सो हो, पर आख़िरकार उसने सरकार का भरोसा तो बरकरार रखा है ।

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