अंधेरे की सियासत में बुझता लोकतंत्र का दीया ।

अंधेरा घना है और अंधेरे की सियासत तले लोकतंत्र का उजियारा खोजने की कोशिश हो रही है ।

मौजूदा वक्त में लोकतंत्र का ये ऐसा रास्ता है जिसने आजादी के बाद से ही सत्ता हस्तांतरण के उस मवाद को उभार दिया है, जिसमें देश चाह कर भी बार बार 1947 की उसी परिस्थिति में जा खडा होता है जहां न्याय और समानता शब्द गायब रहे । ये कोई आश्चर्ययजनक नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट आज लोकतंत्र को खतरे में होने एलान कर दें और देश में आह तक ना हो ।

न्यायपालिका खुद के संकट को उभारे और समाज में कोई हरकत ना हो ।

चुनाव आयोग की स्वतंत्र पहचान खुले तौर पर गायब लगे और आयोग के भीतर से ही आवाज आये कि सत्तानुकुल ना होने पर बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, या…. सत्ता के विरोध के स्वर को जगह भी चुनाव आयोद में दर्ज नहीं की जाती, और समाज के भीतर कोई हलचल नहीं होती ।

एक तरफ ईवीएम के जरीये तकनीकी लोकतंत्र को जीने का सबब हो तो दूसरी तरफ यही ईवीएम सत्ता के लिये खिलौना सरीखा हो चला हो । पर देश तो लोकतंत्र तले जीने का आदी है तो कोई उफ नही निकलता ।

आश्चर्य तो इस बात भी नहीं हो पा रहा है कि रिजर्व बैंक जनता के पैसो की लूट के लिये समूची बैकिंग प्रणाली को भी सत्ता के कदमों में झुकाने को तैयार है,

और जनता के भीतर से कोई विरोध हो नहीं पाता । खुलो तौर पर जनता के बैंकों में जमा रुपयों की कर्ज लूट होती है । रईस कानून व्यवस्था को घता बता कर फरार हो जाते हैं,

लेकिन संसद कानून का राज कहकर लोकतंत्र की चादर ओढ लेती है । और तो और किसी तरह की कोई बहस अपने ही बच्चों की शिक्षा के गिरते स्तर या शिक्षा की तरफ की जा रही अनदेखी को लेकर भी मां-बाप में नहीं जाग रहे हैं ।

प्रीमियर जांच एंजेसी सीबीआई के भीतर डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर यानी वर्मा-आस्थाना के खुले तौर पर भ्रष्ट होने के आरोपो पर भी समाज में कोई हरकत नहीं हुईऔर खुले तौर पर पीएमओ की दखलअंदाजी को लेकर भी बहुसंख्यक तबका सिर्फ तमाशबीन ही बना रहा है । कैसे और किस तरह से पीने लायक पानी, स्वच्छ पर्यावरण, हेल्थ सर्विस सबकुछ बिगाड कर सत्ताधारियो ने लोकतंत्र का पाठ चुनाव के एक वोट पर जा टिकाया और बेबस देश सिर्फ देखता रहा । और कैसे बेबसी से मुक्ति के लिये हर पांच बरस बाद होने वाले चुनाव को ही उपचार मान लिया गया । यानी सत्ता परिवर्तन के जरीये लोकतंत्र के मिजाज को जीना और सत्ता के लिये देश में लूटतंत्र को कानूनी जामा पहना देना , दोनो हालातो को को देश के हर वोटर ने जिया है और हर नागरिक ने भोगा है । इससे इंकार कौन करेगा । 1947 के बाद संसद हर पांच बरस में सजती संवरती रही । जनता की भागीदारी संसद को ही लोकतंत्र का मंदिर मान कर समती गई । और 2014 में जब पहली बार किसी नये नवेले प्रधानमंत्री ने संसद की जमीन को माथे से लगाया तो लोकतंत्र का पावन रुप हर उस आंख में बस गया जिन आंखो ने 1952 से लेकर 2014 तक संसद के भीतर बाढ-सूखा की तबाही ,मंहगाई तले पिसते मध्यम वर्ग , अनाज की किमत तक ना मिलपाने से कर्ज में डूबे किसान की खुदकुशी , न्यूनतम मजदूरी के ना मिलने पर तिल तिल मरते परिवार , गांव गांव में पीने के पानी के लिये भटकते लोग , दो जून की रोटी के लिये गांव से पलायन करते किसानी छोड मजदूर बन शहरो की सडको पर भटकते परिवार के परिवार । तमाम मुद्दो पर संसद की अंसेवनशीलता भी हर किसी ने हर दौर में देखी । आलम ये भी रहा कि 15 फिसदी सांसदो की मौजदगी भी इन मुद्दो पर बहस के वक्त नहीं रहती और बिना कोरम पूरा हुये संसद में जिन्दगी से जुडे मुद्दो को सिर्फ सवाल जवाब में खत्म कर दिया जाता । जिन मुद्दो पर सत्ता को विपक्ष घेरता और उन्ही मुद्दो पर न्याय दिलाने की आस बनाकर विपक्ष सत्ता पाता और सत्ता पाने के बाद उन्ही मुद्द को भूल जाता । ये सब कैसे कोई भूल सकता है । शायद इसीलिये अंधेरा धीरे धीरे गहराता रहा और समूचे समाज ने आंखे मूंद रखी थी ।क्योकि लोकतंत्र के आदि हो चले भारत में आवाज उठाने कर असर डालने का हक उसी राजनीति , उस सियासत के मत्थे थोप दिया गया जिसने अंधेरे को फैलाया और धीरे धीरे गहराया । 1947 में बहस थी हाशिये पर जी रही जातिया या समुदायो को भारत की मुख्यधारा से जोडने के लिये आरक्षण के जरीये रियायत दी जाये । आर्थिक तौर पर विपन्न तबको को सत्ता रुपये बांट कर राहत दें । मुफ्त या सस्ते आनाज को बांटे । पर धीरे धीरे आरक्षण राजनीतिक हथियार बन गया और हाशिये पर रहने वाली जातियो को मुख्यधारा से जोडने के बदले उन्हे ही मुख्यधारा बनाने की कोशिश शुरु हो हई । दलित-आदिवासी-मुस्लिमो की बस्तियो मे स्कूल, हेल्थ सेंटर या जीने की जरुरतो की व्यवस्था नहीं की गई बल्कि हाशिये पर के लोगो को सियासी दान-दक्षिणा या सब्सडी या राजनीतिक रुपयो की राहत तले ही लाया गया । हर राज्य ने दो से पाच रुपये में सस्ता खाना मुहैया कराने के लिय दुकाने खोल दी । और लूट उसमें भी होने लगी । रईसो को मुफ्त आनाज बांटने का ठका भी चाहिये और मीड डे मिल का टेंडर भी चाहिये । क्योकि देश बडा है करोडो लोग है तो लूट का एक कौर भी करोडो के वारे न्यारे कर देता है ।
ऐसे में कोई क्या कहे क्या सोचे कि 70 बरस की उम्र युवा लोकतंत्र के नारे तले छोटी लग सकती है लेकिन 70 बरस का मतलब पांच पीढियो का खपना है और 31 करोड की जनसंक्या से 130 करोड तक पहुंचना भी है । और साथ ही 1947 के वक्त के भारत के बराबर तीन भारत को गरीबी मुफलिसी , हाशिये पर ढकेल कर संसदीय लोकतंत्र के रहमो करम पर टिकाना भी है । और जो पीडा इस अंधेरे में समाये भारत के भीतर है उससे अनभिज्ञ या फिर उस तरह आंख मूंद कर कौन से भारत को विकसित बनाया ज सकता है ये सवाल मुबई की झोडपट्टियो में से निकले एंटीला इमरत को देख कर कुछ हद तक तो समझा जा सकता है । लेकिन समूचा सच 2014 के बाद जिस तरह खुले तौर पर उभरा उसने पहली बार साफ साफ संकेत दे दिये कि अंधेरो की रजामंदी से उजियारे में रहने वालो को खत्म किया जा सकता है या फिर उनके लोकतंत्र को धराशायी कर हशिये पर लडे तबको में इस उल्लास को भरा जा सकता है कि सत्ता ने उनके लोकतंत्र को जिन्दा कर दिया है । कयोकि देश में अब सिर्फ अंधेरा होगा । और सडक पर बिलबिलाते समाज को ये रोशनी दिखायी देगी कि उनके हिस्से का अंधेरा और हर जगह छाने लगा है । लोकतंत्र के इस मवाद को कोई सत्ता के लिये भी हथियार बना सकता है ये इससे पहले कभी किसी ने सोचा नहीं या फिर इससे पहले संसदीय लोकतंत्र की उम्र बची हुई थी इसलिये किसी ने ध्यान ही नहीं दिया । हो जो भी लेकिन अंधेरे की सत्ता लोकतंत्र के उजियारे को कैसे अपनी मुठठी में कौद कर सकती है और कैसे ढहढहाकर लोकतंत्र सत्ता के आगे नतमस्तक हो सकता है उसकी लाइव कमेन्ट्री देस देश भी रहा है और भोग भी रहा है । संसदीय लोकतंत्र में अब ये इतिहास के पल हो चुके है कि जनता के मुद्दे होने चाहिये । उम्मीदवारो की पहचान होनी चाहिये । मुद्दो के जरीये संसद की जरुरत होनी चाहिये और उम्मीदवारो क जरीये समाज के अलग अलग तबके से सरोकार होने चाहिये । यानी ये महसूस होना चाहिये कि संसद में जनता के प्रतिनिधित्व करने वाले पहुंचे है । और भारत की विवधता को संसद समेटे हुये है । पर अब तो ना मुद्दे मायने रखते है ना ही उम्मीदवार । और ना ही संसद की वह गरिमा बची है जिसके आसरे जनता में भावनात्मक लगाव जागे कि संसद चल रही है तो उनकी जिन्दगी से जुडे मुद्दो पर बात होगी । रास्ता निकलेगा । अब ना तो हमारे पास संसद की गरिमा है । ना ही हमारे पास संविधान की व्याख्या करने वाली सु्रीम कोर्ट है । ना ही कोई संविधानिक सस्थान है जो सत्ताधारियो पर लगते आरोपो की जाच तो दूर सत्ता की मर्जी के बिना अपने ही काम को कर सके । ना ही हर पांच बरस बाद लोकंतत्र को जीने की स्वतंत्रता का एहसास कराने वाला चुनाव आयोग है । ना ही मानवाधिकार आयोग है जो जनता के हक की रक्षा का भरोसा जगाये । ना ही किसान-गरीब-मजदूरो के हके के सवालो को लिये संघर्ष करने वाले समाजसेवी संगठन है । ना ही ऐसे शिक्षा संस्थान है जो दुनिया की दौड में भारतीय बच्चो पर खडा कर सके , शिक्षित कर सके । और ना ही हमारे पास राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का वो एहसास है जो राजनीति को सहकार-सरोकार और बहुसंख्यक जनता से जोडने की दिशा में ले जाये । अब हमारे पास मजदूरो की ऐसी फौज है जिसके लिये कोई काम है ही नहीं । किसानो की बदहाली है जिनके लिये सिवाय खुदकुशी के कुछ देने की स्थिति में सत्ता नहीं है । अब हमारे पास अरबपतियो की ऐसी कतार है जो देश में लूट मचाकर दुनिया के बाजार में अपन धमक बनाये हुये है । अब हमारे पास बेरोजगारो की ऐसी फौज है जो राजनीति पार्टियो में नौकरी कर रही है या कैरियर बनाने के लिेये नेताओ की चाकरी में जुटी है । अब हमारे पास अपराधी और भ्रष्ट्र सांसदो विधायको की ऐसी फौज है जो जनता के प्रतिनिधी बनकर संविधान को खत्म कर संविधान से मिले विशेषाधिकार का भी लुत्फ उठा रही है और अपराध भी खुले तौर पर कर रह है । अब हमारे पास कानून-व्यवस्था नहीं है बल्कि सडक पर लिचिंग कर न्याय देने का जंगल कानून है । अब हमारे पास ऐसी फौज है जो बिना वर्दी फौज से ज्यादा ताकत रखती है । फिर हमारे पास अब नये चेहरे के साथ नाथूराम गोडसे भी है । और इस आधुनिक पूंजी पर अंगुली उटाने वाले या सवाल करने वाले या तो लुटियन्स के बौध्दिक करार दिया जा चुके है या फिर शहरी नक्सलवादी या फिर खान मार्केट के ग्रूप या फिर देश द्रोही या पाकिस्तान की हिमायती । तो संविधान के नाम पर ही जब सत्ता लोकतंत्र को हडप कर अंधेरे को ही देश का सच बताने निकल पडी हो तो फिर सवाल ये नही है कि चुनाव के जरीये देश के नागरिको ने लोकतंत्र को जीया या नहीं । बल्कि सवाल तो ये है कि एक वोट का लोकतंत्र भी गायब हो गया । क्योकि नागरिक भी ईवीएम के सामने बौना हो गया और ईवीएम में समाये लोकतंत्र में सत्ता को ना तो बीजपी की जरुरत है और ना ही संघ परिवार की । तो लोकतंत्र को जीते देश में जनता के प्रतिनिधी हो या नौकरशाही या फिर न्यायपालिका हो या मीडिया । जो जितनी जल्दी मान लें कि उसकी भागेदारी बटी ही नहीं उसके लिये उतनी ही जलदी ठीक हालात होगें । क्योकि लोकतंत्र की नई परिभाषा में सत्ता के लिये काम करते लोकतंत्र के स्तम्भ ही असल स्तम्भ है । इसीलिये जो सोच रहे है कि आने वाले वक्त में चुनाव की जररत ही नहीं होगी । उसका पहला एहसास तो 2019 में ही हो गया कि जितना लोकतंत्र [ ईवीएम़ ] वोटिंग बूथों के भीतर थे उससे ज्यादा लोकतंत्र बूथो के बाहर था । आप बूथो के बाहर कतारों में खडे थे, और बाहर बिना कतार ज्यादा अनुशासत्मक तरी

के से लोकतंत्र का ठप्पा लग रहा था । तो एक वक्त इंदिरा ने लोकतंत्र खत्म कर एमरजेन्सी को अनुशासनात्मक कारर्वाई कहा था और अब सत्तानुकुल अनुशासानात्मक ठप्पे को ही लोकतंत्र कहा जा रहा है ।

देश बहुत आगे निकल चुका है । आप कहीं पिछड तो नहीं गये ।

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Many Muslims have exhausted their capacity to feel fear

Pragya Thakur, an accused in the 2008 Malegaon blasts that killed six people, is contesting the general elections. As a Muslim, am I scared by this development? No.

Am I worried Maneka Gandhi won’t offer work to Muslims if they don’t vote for her? Far from it. I am actually amused by her ‘threat’. Am I offended when Yogi Adityanath compares “Ali” with “Bajrang Bali”? Yawn. I wish he could find better rhymes.

Am I angry with most TV anchors for their pro-Modi stance? No, I feel sorry for their inability to practise the courage that journalism requires.
I, the Indian Muslim, have come a long way from feeling a sense of fear, anger or resignation over the politics of hate that has been directed against me in the last five years.

Since it was elected to power in May 2014, the Modi-led government has left no stone unturned to corner Muslims — it has rewarded mob violence against members of the community, its leaders regularly spew anti-Muslim rhetoric, it has directed the media to further its divisive agenda, it has allowed the WhatsApp rumour factory to flourish, peddling the imagined fear of “Hindu khatre mein hai”.

The government’s attempts have met a degree of success, with Muslims often acting on fear, such as not carrying meat in trains, not driving or walking too close to a cow, not giving their children “too Muslim sounding” names.

But every emotion, including fear, has a threshold, beyond which it begins to wane, and eventually ceases to exist. Each adversity also carries an opportunity within. Around 2017, by when Mohsin Sheikh, Akhlaq, Junaid and Pehlu Khan were hacked to death, Muslims began channelising their fear, their alienation into a need to strengthen their community from within. From lamenting “what we fear”, Muslims began talking “what we must do”. These were not just living-room conversations. Muslims are on the field today, in a slum or in a village, working towards empowering their more vulnerable coreligionists.

A group of Muslims in my hometown, Lucknow, for example, has adopted a village in adjoining Sitapur district. There, they counsel parents to send their children to the local government school, they have launched adult education classes, hired Hindi and English teachers for the village madarsa, installed a clean drinking water facility, and formed self-help groups for women.

A Muslim woman, who is a PhD in management, has opened a school in her hometown, Balrampur, in eastern UP. Her team goes door to door to convince underprivileged Muslim families to send their children to school.

A group of Muslim women in Lucknow runs a kitchen that employs needy co-religionists so that the latter can spend on the uplift of their children.

These initiatives are self-financed, free from state or political intervention, and their common objective is to ensure long-term socio-economic empowerment of the community. I cite examples from my hometown, but I wouldn’t be surprised by similar initiatives elsewhere.

Economic laggardness has made Muslims vulnerable to political attacks and contributed to their unpopular (unfair as that may sound) image. Fixing their financial standing, Muslims feel, is the primary way to protect future generations from demonisation by the media, the state and political parties.

It’s not as if Muslims in the past did not undertake long-term community initiatives. In Lucknow, at least three privately-owned institutions — a university, a medical college and a law institute — were established by Muslims some decades ago. But a sense of urgency has set in over the last five years. Every Muslim I know wants to “do something” for the community — an emotion previously limited to a few visionaries. Ordinary Muslims are doing what they can — some are giving money, others their time or ideas — to local, grass roots projects within their reach. This attitude contrasts the earlier approach of ordinary Muslims, where consolidating as a community meant voting against the BJPduring elections. Indeed, many Muslims have begun to see the opportunity in the adversity, the strength in the weakness, the hope in the fear.

This positivity is a surprising yet natural outcome of the politics of the time. The Modi government, by spreading its communal agenda over sporadic episodes of lynchings and hate speeches, cleverly applied the logic of diminishing outrage: With each successive lynching or hate speech, the public outrage diminished. Pratap Bhanu Mehta correctly wrote in his article “the silence be damned”( IE, June 27, 2017): “big riot would concentrate the mind, make a damning headline. A protracted riot in slow motion, individual victims across different states, simply makes this appear another daily routine. This makes opposing it harder; it makes holding onto the outrage nearly impossible.”

For the besieged community, the logic of diminishing fear applies. It is difficult, impossible to hold on to fear for too long. Many Muslims have exhausted their capacity to feel fear. Hope has taken over them, buttressed by efforts to improve overall condition.

Alienating Muslims, of course, has only been an appendage to the government’s larger project of developing a misplaced sense of Hindu pride – one that depends on the demonisation of Muslims. As an ordinary Muslim who has outgrown her fear, I hope the ordinary Hindu too has outgrown the anti-Muslim hate her conscience has been fed with in the last five years.

Like fear, hate can’t be held on to for too long. Both have an expiry date. My fear has expired. Has your hate too?

बनारस की पावन धरा पर मोदी का मायावी संसार !

खाक भी जिस जमीं की पारस है,

शहर मशहूर यह बनारस है।

तो क्या बनारस पहली बार उस राजनीति को नया जीवन देगा जिस पर से लोकतंत्र के सरमायेदारों का भी भरोसा डिगने लगा है। फिर बनारस तो मुक्ति द्वार है ।

और संयोग देखिये वक्त ने किस तरह पलटा खाया, जो बनारस 2014 में हाई प्रोफाइल संघर्ष वाली लोकसभा सीट थी , 2019 में वही सीट सबसे फिकी लडाई के तौर पर उभर आई । जी, देश के सबसे बडे ब्रांड अंबेसडर के सामने एक ऐसा शख्स खडा हो गया जिसकी पहचान रोटी – दाल से जुडी है । यानी चाहे अनचाहे नरेन्द्र मोदी का ग्लैमर ही काफूर हो गया जो सामने तेज बहादुर खडा हो गया । राजनीतिक तौर पर इससे बडी हार कोई होती नहीं है कि राजा को चुनौती देने के लिये राजा बनने के लिये वजीर या विरोधी नेता चुनौती ना दे बल्कि जनता से निकला कोई शख्स आ खडा हो जाये , और कहे मुझे राजा नहीं बनना है । सिर्फ जनता के हक की लडाई लडनी है ।

तो फिर राजा अपने औरे को कैसे दिखाये ?और किसे दिखाये ?

क्योंकि राजा की नीतियो से हारा हुआ शख्स ही राजा को चुनौती देने खडा हुआ है, तो फिर राजा के चुनावी जीत के लिये प्रचार की हर हरकत अपनी जनता को हराने वाली होगी । जो जनता की नहीं राजा की हार होगी । और ये सच राजा समझ गया तो व्यवस्था ही ऐसी कर दी गई कि जनता से निकला शख्स सामने खडा ही ना हो पाये । तो सूखी रोटी और पानी वाले दाल की लडाई करने वाले तेजबहादुर का पर्चा ही उस चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया जो खुद राजा की रहनुमाई पर जी रहा है !

तो क्या ये मान लिया जाये कि ये बनारस की ही महिमा है जिसने मुक्ति द्वार खोल दिया है, और मोक्ष के संदेश देने लगा है । क्योकि बनारस को पुराणादि ग्रंथो के आसरे परखियेगा तो पुराणकार बताते हैं, कि काशी तीनो लोकों में पवित्रतम स्थान रखती है , ये आकाश में स्थित है तछा मर्त्यलोक से बाहर है….

वाराणसी महापुण्या त्रिषुलोकेषु विश्रुता । / अन्तरिक्षे पुरी सा तु मर्त्यलोक बाह्रात ।।
हे पार्वती ! तीनो लोको का सार मेरी काशी सदा धन्य है :

वाराणसीति भुवनत्रयसारभूता धन्या सदा ममपुरी गिरिराजपुत्री ।

लेकिन बनारस तो सियासी छल कपट, धोखा-फरेब की सियासत में इस तरह जा उलझी है, जहां राजा एक राज्य संभालते हुये चुनावी दस्तावेज में खुद को अविवाहित बताता है , …………………..

…………………… लेकिन देश संभालने के वक्त खुद को विवाहित बताता है । शिक्षा करत हुये मिलने वाली डिग्री भी चुनाव दर चुनाव बदलती है । लेकिन राजा तो राजा है । इसलिये वसंतसेना भी जब पांच बरस में ग्रेजुएट से बारहवी पास हो जाती है तो भी चुनाव आयोग को कुछ गलत नहीं लगता । और तो और देश भर में चुनाव लडने वालो में 378 उम्मीदवार आपराधी या भ्र्ष्टाचार के दायरे में है , लेकिन लोकतंत्र ऐसी खुली छूट देता है, कि चुनाव आयोग उन्हें छू भी नहीं पाता ।

लेकिन जनता से निकला तेजबहादुर जब राजा की नीतियो पर रोटी का सवाल उठाकर शिंकजा कसता है तो पहले नौकरी से बर्खास्गी, फिर लोकतंत्र की परिभाषा तले चुनाव लडने पर ही रोक लगाने में समूचा अमला लग जाता है । जिससे राजा को कोई परेशानी ना हो कि आखिर वह जनता को क्या कहेगा ? ….. जनता को हरा दो !!

मुश्किल है, तो फिर राजा काशी की महत्ता उसके सच को क्या जानें । वह तो आस्था को चुनावी भावनाओं की थाली में समेट पी लेना चाहता है । तभी तो काशी की पहचान को ही बदल दिया जाता है ।

ऐसे में काशी की वरुणा और अस्सी नदी तो दूर गंगा तक को ठगा जा रहा है……. तो फिर अतीत की काशी को कौन परखे कैसे परखे ?

एक वक्त माना तो ये गया कि वरुणा और अस्सी नदियों के बीच स्थित बनारस में स्नान , जप , होम, मरण और देवपूजा सभी अक्षय होते हैं । लेकिन गंगा का नाम लेकर सियासत इन्हें भूल गई और गंगा की पहचान बनारस में है क्या …!

इस समझ को भी सत्ता सियासत समझ नहीं पायी ।

बनारस में गंगा का पानी भक्त कभी घर नहीं ले जाते । क्योंकि बनारस में तो गंगा भी मुक्ति द्वार है । काशी के प्रति लोगो में आस्था इस हद तक बढी कि लोग विधानपूर्वक आग में जलकर और गंगा में कूदकर प्राण देने लगे , जिससे कि मृतात्मा सीधे शिव के मुख में प्रवेश कर सके । उन्नीसवी सदी तक लोग मोक्ष पाने के विचार से , यहां गंगा में गले में पत्थर बांधकर डूब जाते थे । आज भी इस विचार को समेटे लोगों के बनारस पहुंचने वाले कम नहीं है । लेकिन अब तो इक्किसवीं सदी है । और गंगा मुक्ति नहीं माया का मार्ग है ।

इसीलिय तो बनारस की सडको पर मु्क्ति नहीं सत्ता का द्वार खोजने के लिये जब तीन लाख से ज्यादा लोगो को नरेन्द्र मोदी के प्रचार क लिये लाया गया और गंगा को समझे बगैर , बनारस की महत्ता जाने बगैर अगर मेहनताना लेकर सभी राजा के लिये नारा लगाते हुये आये और खामोशी से लोट गये तो फिर चाहे अनचाहे भगवान बुद्द याद आ ही जायेगें । भगवान बुद्द भी अपने धर्म का प्थम उपदेश देने सबसे पहले बनारस ही आये थे । उन्होने कहा था….

भेदी नादयितुं धर्म्या काशी गच्छामि साम्प्रतम ।
न सुखाय न यशसे आर्तत्राणाय केवलम् ।।

यानी धर्मभेरी बजाने के लिये इस समय मै काशी जा रहा हूं – न सुख के लिये और न यश के लिये, अपितु केवल आर्तो की रक्षा के लिये ।

तो हालात कैसे बिखरे हैं ?

संस्कृति कैसे बिखरी है ? इसलिये बनारस की पहचान अब खबरो के माध्यम से जब परोसी जाती है तो चुनावी बिसात पर बनारस की तहजीब, बनारस का संगीत , बनारस का जायका या फिर बनारस की मस्ती को खोजने में लगते हैं । और काशी की तुलना में दिल्ली को ज्यादा पावन बताने में कोई कोताही भी नहीं बरतता है ।
लेकिन 2019 में नरेन्द्र मोदी और तेज बहादुर का सियासी अखाड़ा बनारस बना तो फिर बनारस या तो बदल रहा है या फिर बनारस एक नये इतिहास को लिखने के लिये राजनीतिक पन्नों को खंगाल रहा है। बनारस से महज १५ कोस पर सारनाथ में जब गौतम बुद्द ने अपने ज्ञान का पहला पाठ पढ़ा, तब दुनिया में किसी को भरोसा नहीं था गौतम बुद्द की सीख सियासतों को नतमस्तक होना भी सिखायेगी और आधुनिक दौर में दलित समाज सियासी ककहरा भी बौध धर्म के जरीये ही पढेगा या पढ़ाने की मशक्कत करेगा।

गौतम बुद्ध ने राजपाट छोडा था। मायावती ने राजपाट के लिये बुद्द को अपनाया। इसी रास्ते को रामराज ने उदितराज बनकर बताना चाहा और समाजवादी पार्टी ने तो गौतम बुद्द की थ्योरी को सम्राट अशोक की तलवार पर रख दिया। सम्राट अशोक ने बुद्दम शरणम गच्छामी करते हुये तलवार रखी और अखिलेश यादव ने तेजबहादुर के निर्दलिय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरने के बाद समझा कि समाजवादी बनाकर संघर्ष करवा दिया जाये तो सियासत साधी जा सकती है !

तो अखिलेश ने “सत्ता गच्छामी” करते हुये सियासी तलवार भांजनी शुरु की। पर बनारस तो मुक्ति पर्व को जीता रहा है, फिर यहां से सत्ता संघर्ष की नयी आहट नरेन्द्र मोदी ने क्यों दी !

मोक्ष के संदर्भ में काशी का ऐसा महात्म्य है कि प्रयागगादु अन्य तीर्थो में मरने से अलोक्य, सारुप्य तथा सानिद्य मुक्ती ही मिलती है और माना जाता है कि सायुज्य मुक्ति केवल काशी में ही मिल सकती है। तो क्या सोमनाथ से विश्वनाथ के दरवाजे पर दस्तक देने नरेन्द्र मोदी 2014 में इसलिये पहुंचे कि विहिप के अयोध्या के बाद मथुरा, काशी के नारे को बदला जा सके! या फिर संघ परिवार रामजन्मभूमि को लेकर राजनीतिक तौर पर जितना भटका, उसे नये तरीके से परिभाषित करने के लिये मोदी को काशी चुनना पड़ा। लेकिन 2019 में जिस तरह काशी को मोदी ने सियासी तौर पर आत्मसात कर लिया है उसमें मोदी कहीं भटके नहीं है । क्योंकि काशी को तो हिन्दुओं का काबा माना गया। याद कीजिये गालिब ने भी बनारस को लेकर लिखा,

” तआलल्ला बनारस चश्मे बद्दूर, बहिस्ते खुर्रमो फिरदौसे मामूर, इबादत खानए नाकूसिया अस्त, हमाना काबए हिन्दोस्तां अस्त। “

यानी हे परमात्मा, बनारस को बुरी दृष्टि से दूर रखना, क्योंकि यह आनंदमय स्वर्ग है। यह घंटा बजाने वालों अर्थात हिन्दुओं का पूजा स्थान है, यानी यही हिन्दुस्तान का काबा है।

तो फिर तेज बहादुर यहां क्यों पहुंचे ?

क्या तेज बहादुर काशी की उस सत्ता को चुनौती देने पहुंचे हैं, जिसके आसरे धर्म की इस नगरी को बीजेपी अपना मान चुकी है ? या फिर तेजबहादुर के अक्स तले अखिलेश यादव को लगने लगा है कि राजनीति सबसे बड़ा धर्म है और धर्म सबसे बड़ी राजनीति।

संघ परिवार धर्म की नगरी से दिल्ली की सत्ता पर अपने राजनीतिक स्वयंसेवक को देख रहा है। और अखिलेश यादव , तेजबहादुर यादव के जरीये काशी में नैतिक जीत से दिल्ली की त्रासदी से मुक्ति चाहने लगे । तो क्या सबसे प्राचीन नगरी काशी को ही सियासत पंचतंत्र की कहानियों में तब्दील करना चाहती है ?

जिससे यहां की सांस्कृतिक महत्ता खत्म हो जाये ।

क्योंकि बनारस की राजनीतिक बिसात का सच भी अपने आप में चुनौतीपूर्ण है !

क्योंकि जितनी तादाद यहां ब्राह्मण की है, उतने ही मुसलमान भी हैं। करीब ढाई-ढाई लाख की तादाद दोनों की है। पटेल डेढ़ लाख तो यादव एक लाख हैं, और जायसवाल करीब सवा लाख। मारवाडियों की तादाद भी ४० हजार है। इसके अलावा मराठी, गुजराती, तमिल , बंगाली, सिख और राजस्थानियों को मिला दिया जाये तो इनकी तादाद भी डेढ लाख से उपर की है। तो 17 लाख वोटरों वाले काशी में मोदी का शंखनाद गालिब की तर्ज पर हिन्दुओं का काबा बताकर मोदी का राजतिलक एक बार फिर कर देगा या फिर काशी को चुनौती देने वाले कबीर से लेकर भारतेन्दु की तर्ज पर तेजबहादुर की चुनौती स्वीकार करेगा। क्योंकि गालिब बनारस को लेकर एकमात्र सत्य नहीं है।

इस मिथकीय नगर की धार्मिक और आध्यात्मिक सत्ता को चुनौतियां भी मिलती रही हैं। ऐसी पहली चुनौती १५ वी सदी में कबीर से मिली। काशी की मोक्षदा भूमि को उन्होंने अपने अनुभूत-सच से चुनौती दी और ऐसी बातों को अस्वीकार किया। उन्होंने बिलकुल सहज और सरल ढंग से परंपरा से चले आते मिथकीय विचारों को सामने रखा और बताया कि कैसे ये सच नहीं है।

अपने अनुभव ज्ञान से उन्होने धार्मिक मान्यताओं के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जो एक ओर काशी की महिमा को चुनौती देता था तो दूसरी ओर ईश्वर की सत्ता को। उन्होंने दो टूक कहा-जो काशी तन तजै कबीरा। तो रामहिं कौन निहोरा। यह ऐसी नजर थी , जो किसी बात को , धर्म को भी , सुनी -सुनायी बातो से नहीं मानती थी। उसे पहले अपने अनुभव से जांचती थी और फिर उस पर भरोसा करती थी।
काशी का यह जुलाहा कबीर कागद की लेखी को नहीं मानता था, चाहे वह पुराण हो या कोई और धर्मग्रंथ। उसे विश्वास सिर्फ अपनी आंखो पर था। इसलिये कि आंखों से देखी बातें उलझाती नहीं थी…

तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी।

मैं कहता सुरझावनहरी, तू देता उरझाई रे। ।

वैसे बनारस की महिमा को चुनौती तो भारतेन्दु ने १९ वी सदी में भी यह कहकर दी…..

देखी तुमरी कासी लोगों , देखी तुमरी कासी। जहां बिराजे विस्वनाथ , विश्वेश्वर जी अविनासी। ।

ध्यान दें तो बनारस जिस तरह २०१४ का सियासी अखाडा बन रहा था 2019 के हालात ठीक उसके उलट हैं ।

2014 में नेताओ के कद टकरा रह थे । 2019 में जनता के कद के आगे राजा का बौनापन है, जो बनारस को जीता है और जीत भी सकता है । यानी 2014 में सियासी आंकड़े में कूदने वाले राजनीति के महारथियों को जैसे-जैसे बनारस के रंग में रंगने की सियासत भी शुरु हुई है, वह ना तो बनारस की संस्कृति है, और ना ही बनारसी ठग का मिजाज।

लेकिन अब तो वाकई काशी की जमीन पर गंवई अंदाज में काशी मे मुक्ति का सवाल है । और मुक्ति जीत पर भारी है । इसे दिल्ली का राजा चाहे ना समझे लेकिन काशी वासी समझ चुके हैं ।

पर उनकी समझ को भी राजा अपने छाती पर तमगे में टांगना चाहता है । पर राजा ये नहीं जानता कि काशी को जीत कर वह हार रहा है

क्योंकि राजा का लक्ष्य तो अमेरिका है । और बनारस ने बिसमिल्ला खां के दिल को जीता है ।।

बिस्मिल्ला खां ने अमेरिका तक में बनारस से जुड़े उस जीवन को मान्यता दी, जहां मुक्ति के लिये मुक्ति से आगे बनारस की आबो हवा में नहाया समाज है।

शहनाई सुनने के बाद आत्ममुग्ध अमेरिका ने जब बिस्मिल्ला खां को अमेरिका में हर सुविधा के साथ बसने का आग्रह किया तो बिस्मिल्ला खां ने बेहद मासूमियत से पूछा, सारी सुविधा तो ठीक है लेकिन गंगा कहां से लाओगे !

और बनारस का सच देखिये। गंगा का पानी हर कोई पूजा के लिये घर ले जाता है, लेकिन बनारस ही वह जगह है जहा से गंगा का पानी भरकर घर लाया नहीं जाता । तो ऐसी नगरी में मोदी किसे बांटेंगे या किसे जोड़ेंगे ?

वैसे भी घंटा-घडियाल, शंख, शहनाई और डमरु की धुन पर मंत्रोच्चार से जागने वाला बनारस आसानी से सियासी गोटियों तले बेसुध होने वाला शहर भी नहीं है।

बेहद मिजाजी शहर में गंगा भी चन्द्राकार बहती है बनारस हिन्दु विश्वविघालय के ३५ हजार छात्र हों, या काशी विधापीठ और हरिश्चन्द्र महाविधालय के दस -दस हजार छात्र।

कोई भी बनारस के मिजाज से इतर सोचता नहीं और छात्र राजनीति को साधने के लिये भी बनारस की रंगत को आजमाने से कतराता नहीं। फिर बनारस आदिकाल से शिक्षा का केन्द्र रहा है, और अपनी इस विरासत को अब भी संजोये हुये हैं।

ऐसे में सेना के जवान हाथो में सूखी रोटिया और पानी की दाल का सच दिखाकर पहचान पाये हैं, तो दूसरी तरफ गुजरात के ‘राजधर्म’ और दिल्ली के ‘लोकतंत्र’ पर चढाई कर नरेन्द्र मोदी बनारस में हैं ।

मोदी की बिसात पर बनारसी मिजाज प्यादा हो नहीं सकता और तेज बहादुर सियासी बिसात पर चाहे प्यादा साबित हो खारिज कर दिये गये, लेकिन बनारसी मिजाज तो उन्हें मोक्ष दे रहा है ।

क्योंकि मोदी वजीर बनने के लिये लालालियत है, और तेज बहादुर मुक्ति पाने की छटपटाहट में बनारस पहुंचे हैं ।

तो फिर बनारस का रास्ता जायेगा किधर। नजरें सभी की इसी पर हैं। क्योंकि बनारस की बनावट भी अद्भुत है….यह आधा जल में है । आधा मंत्र में है । आधा फूल में है । आधा शव में है । आधा नींद में है। आधा शंख में है ।

और काशी का आखरी सच यही है कि यहां सूई की नोंक भर भी स्थान नहीं है , जहां जाने वाले को मोक्ष ना मिले ।

और मोक्ष में लिंग, जाति, वर्ण, वर्ग का कोई भेद नहीं होता । तो आप तय किजिये मोक्ष किसे मिलेगा या किसे मिलना चाहिये !

धन्यवाद ।

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कहां गए उनके दिन अच्छे ?

जा रहा था एक रोज मैं अपने खेत के मेढ़ से । देखा एक कृषक का शव लटक रहा था पेड़ से ।।

दबा कर्ज के बोझ से था वह,बिटिया भी अनब्याही थी घर में खाने को कुछ न था, बैंक से कुर्की आई थी ।।

रोया मैं भी जोर-जोर से, उसके शव को देख-देखकर नेतागण हैं जैसे रोते, झूठे आंसू फेंक-फेंककर ।।

कहते हैं अन्नदाता जिनको, वो पेड़ों से लटक रहे हैं जो जीवित बच गए अभी, वो म्रत्यु की खोज में भटक रहे हैं ।।

सरकारी बयान आया,कि कर्ज सबका माफ करो जो किसान पीड़ित हैं, अब उनके प्रति भी इंसाफ करो

कृषक प्रसन्न ओर हर्षित था, सच में बयान आया है क्या ? पर अगले ही पल दिल बोला,देखो चुनाव आया है क्या?

ये सब वादे झूठे हैं, अब वादों पे विश्वास नहीं । अब तो म्रत्यु चुनेंगे कृषक,अब जीवन में आस नहीं।।

फिर से घोर उदासी छाई,काली घटा घनी घिर आई। फिर से अनाथ हुए कुछ बच्चे, कहां गए उनके दिन अच्छे ???

देश को स्वघोषित ‘नायक’ नहीं नीति की जरूरत ।

अगर हमने नीति के बजाय किसी नायक को चुना, तो फिर वह किसी भी दल का क्यों न हो , तो हम फिर से एक अक्षम्य भूल कर रहे होंगे ।


सत्ताधारी शक्तियों की ओर से यह बात फैलाई जा रही है कि एक विशेष नायक का कोई विकल्प नहीं है, उसके समकक्ष कोई दूसरा राजनेता किसी और राजनैतिक दल में है ही नहीं. लोकतंत्र, नायक, प्रतिनायक और खलनायक सभी, अपनी प्रक्रिया से गढ़ता है. जो नायक हम समय सत्तारूढ़ है वह इसी लोकतंत्र ने गढ़ा था और समय आने पर वह उसका विकल्प भी बना देगा. वही उसे सत्तारूढ़ एक बार कर चुका और वही उसे अपदस्थ भी कर सकता है. ऐसे सर्व-शक्तिमान ने सब के खाते में 15 लाख रुपये जमा करने, सबका साथ सबका विकास जैसे कई वायदे किये थे और इनमें से एक भी पूरा नहीं हुआ, पूरे पांच वर्ष निष्कण्टक राज करने के बाद.
ऐसा महाबली अब इन मुद्दों पर बात ही नहीं कर रहा है- यह भी नहीं बता रहा है कि अपने वायदों को पूरा करने में क्या और कैसी बाधाएं आयीं. उलटे रोज़गार-सुशासन-भ्रष्टाचार-ग़रीबी, किसानों की हालत, आदिवासियों की दुर्दशा पर कुछ कह ही नहीं रहा है. हम एक विफल और ग़ैरजवाबदेह नायक को चीखते-पुकारते देख रहे हैं. वह देश की सुरक्षा, पाकिस्तान से ख़तरे आदि से भारतीय मानसिकता का अनोखा सैन्यीकरण कर रहा है और हारकर हिन्दू-मुसलिम अलगाव का पुराना गुजराती खेल खेल रहा है. हमने पिछली बार नायक को चुना और उसका नतीजा सामने है कि आज भारतीय सामाजिक समरसता जितनी खंडित-विभाजित है वह बंटवारे के समय के बाद कभी नहीं रही, बेरोज़गारी अमूतपूर्व स्तर पर पहुंच गयी है, कई करोड़ लोगों को लोकतांत्रिक और नागरिक हिस्सेदारी से वंचित किया जा रहा है. संविधान की रोज़ धज्जियां उड़ रही हैं. चुनाव आयोग तक इस नायक की आपत्तिजनक अतिशयोक्तियों को, जो रोज़ की जा रही हैं, कायर और दब्बू होकर देख रहा है, बिना कुछ करने की संवैधानिक हिम्मत किये.

स्पष्ट है कि अब हमें नायक नहीं नीति चाहिये. हम नायक पर नहीं नीति पर अपना ध्यान और चुनाव केन्द्रित करें. हमें इस बार नायक नहीं, नीतियां चुनना है. हम याद रखें कि यह नायक स्वयं अपनी पार्टी के घोषणापत्र में प्रस्तावित नीतियों तक का कोई जिक्र नहीं कर रहा है. हमें ऐसी नीतियां चाहिये जो विशाल युवा वर्ग की आकांक्षाओं, उनकी रोज़गार की ज़रूरतों, किसानों की समस्याओं को हल करने, उसी धर्मों के नागरिकों को समान और गरिमामय जीवन बिता सकने, आदिवासियों को उनकी स्वायत्तता वापस देने, न्यायालयों-सेनाओं-प्रशासन-मीडिया को बिना किसी राजनैतिक हस्तक्षेप से काम करने देने, स्त्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, हर अपराधी को बिना भेदभाव के दंडित करने, लेखकों-कलाकारों और उनकी संस्थाओं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वायत्तता देने आदि पर केन्द्रित हों. हम नीति चुनें, नायक नहीं. अगर हमने नीति के बजाय किसी नायक को चुना, फिर वह किसी भी दल का क्यों न हो, तो हम फिर एक अक्षम्य भूल कर रहे होंगे.

साांप्रदायिक विभाजन का दौर

पिछले दिनों रायपुर में एक साहित्यिक आयोजन हुआ था. वहां लोकसभा चुनाव की सरगर्मी थी. तो वहां से एक विश्वसनीय सूत्र ने बताया कि भाजपा और संघ-परिवार ने यह निश्चय किया है कि चूंकि और मुद्दे कारगर नहीं हो रहे हैं, बाक़ी बचे समय में, साम्प्रदायिकता को ज़ोर-शोर से बढ़ावा दिया जाये और हिंदू वोट जीतने के लिए ध्रुवीकरण किया जाये. प्रधानमंत्री द्वारा बार-बार पाकिस्तान से ख़तरे और उसको क़रारा जवाब आदि देने की मुहिम, कत्ल की रात, उसी का हिस्सा है. उनका ताज़ा बयान कि हमारे परमाणु अस्त्र दिवाली के लिए नहीं हैं, भी. नागरिकता क़ानून, धारा 307 आदि का लक्ष्य भी हिंदुओं में एक नये तरह डर पैदा करना और उन्हें भाजपा के पक्ष में झुकाना है. प्रज्ञा ठाकुर, योगी आदित्यनाथ और कई छुटभैये नेताओं के लगभग दैनिक साम्प्रदायिक वक्तव्य आकस्मिक नहीं हैं. वे इस सोची-समझी चुनाव रणनीति का हिस्सा हैं.

यह नोट किये बिना नहीं रहा जा सकता कि जो दल पिछले चुनाव में विकास के मुद्दों पर मुखर और आक्रामक था, वह इस बार उस पर दम साधकर चुप है. बेरोज़गारी, विकास, काले धन पर रोक, भ्रष्टाचार, सुशासन आदि पर कोई उपलब्धि नहीं गिनायी जा रही है. जब-तब शिखर से भी उनके बारे में झूठ ही बोले जा रहे हैं. ज़ाहिर है कि सत्तारूढ़ दल और संघ परिवार पूरी तरह से इस चुनाव को घृणा, भेदभाव और दुश्मनी के आधार पर लड़ने की कोशिश कर रहा है. अगर अधबीच में यह आकलन बना कि फिर भी भाजपा को उतनी सफलता नहीं मिल रही है तो सत्ता कई और अप्रत्याशित अतिवादी क़दम उठा सकती है.

चुनाव में जो होता है वह एक तरफ़, दूसरी तरफ़ इस पूरी तरह से विषाक्त अभियान का एक दुष्परिणाम भारत में सामाजिक समरसता को बहुत कमज़ोर करने का होने जा रहा है. अल्पसंख्यक समुदाय, ख़ासकर मुसलमान, लगातार हाशिये पर ढकेले जा रहे हैं और उनकी लोकतंत्र में हिस्सेदारी में कटौती हो रही है. अगर इस काफ़ी बड़े समुदाय का लोकतंत्र और भारतीय संविधान से विश्वास उठ गया तो इसके बहुत भयानक और उग्र परिणाम होंगे. जो राष्ट्र, बंटवारे की अपार हिंसा के बावजूद, अपने संविधान में अहिंसा के आधार पर बना था, वह हिंदुत्ववादियों के कारण उग्र और हिंसक राष्ट्र में बदल जायेगा. ऐसा हुआ तो सिर्फ़ राष्ट्र और संविधान ही नहीं, भारतीय सभ्यता और उसकी लम्बी-उजली परम्परा संकट में पड़ जायेगी. सिर्फ़ मनुष्यों का खून-ख़राबा नहीं होगा, सभ्यता और परम्परा भी लहूलुहान हो जायेंगे.

यह सब हिंदू धर्म के नाम पर होगा, उसे बचाने के नाम पर जबकि दरअस्ल वह हिंदू धर्म को उसकी सारी तात्विक और आध्यात्मिक सार्थकता में ध्वस्त कर देगा. दूसरे धर्मों के प्रति घृणा से बजबजाते लोग, उनके पास कितना ही बल-शक्ति-सत्ता-धन-दौलत क्यों न हो, न तो सच्चे भारतीय हैं न ही सच्चे हिंदू हो सकते हैं. इस समय सच्चे भारतीय और सच्चे हिंदू के जागने, अपनी सभ्यतामूलक जि़म्मेदारी को समझने और उसके अनुसार सच्चे साहसी मानवीय अन्तःकरण से कर्म करने की ज़रूरत है. क्या ऐसा लोकतांत्रिक, आध्यात्मिक और नैतिक जागरण सम्भव है?

समर्थन और विरोध

हाल ही में 600 से अधिक लेखकों-अध्यापकों ने नरेंद्र मोदी को वोट देने की अपील जारी की है. उसमें पांच-छह तो जाने-माने हिन्दी लेखक हैं, बाक़ी बड़ी संख्या में लेखक के रूप में अज्ञातकुलशील. हमारे लोकतंत्र में सभी नागरिकों को अधिकार है कि समर्थन या विरोध में अपना मत व्यक्त करें. थोड़े दिन पहले दो सौ से अधिक लेखकों आदि ने नफ़रत की शक्तियों को इस चुनाव में हराने की अपील की थी. इस विरोध करनेवाली सूची में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के कम से कम पचास जाने-माने लेखक थे. उल्लेखनीय यह है कि इस अपील में किसी व्यक्ति या दल विशेष का कोई समर्थन व्यक्त नहीं किया गया था ।

सत्ता के समर्थन में लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों के सामूहिक वक्तव्यों का एक सिलसिला हमारे यहां रहा है. उसका अकसर क्या हश्र हुआ इस पर विचार करने से पहले लेखकों-कलाकारों द्वारा व्यापक विरोध के दो-तीन प्रकरण याद कर लेना चाहिये. पहला था फ्रेंच लेखकों-बुद्धिजीवियों द्वारा संगठित, नाज़ी शक्तियों के विरुद्ध, ‘रेज़िस्तांत’ (प्रतिरोध) जिसमें उस समय के सभी बड़े और महत्वपूर्ण लोग शामिल थे. दूसरा था इराक पर अमरीकी हमले के पहले न्यूयार्क रिव्यू आव् बुक्स में अपनी गांठ से धन देकर दो सौ से अधिक लेखकों-वैज्ञानिकों-अध्यापकों आदि द्वारा प्रकाशित एक विज्ञापन जिसका शीर्षक था ‘नाट इन अवर नेम’. यह उस समय अमरीकी सत्ता द्वारा प्रस्तावित हमले का मुखर विरोध था. एक तीसरा प्रकरण यह है जब इण्टरनेशनल पेन ने 2016 में भारत में बढ़ती असहष्णिुता के विरोध में कुछ भारतीय लेखकों द्वारा पुरस्कार वापसी का समर्थन करते हुए विरोध जताया था. इस प्रस्ताव को अनेक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के लेखकों का समर्थन मिला था.

आपातकाल के दौरान अनेक वामपंथी लेखकों ने उसका और इन्दिरा गांधी का समर्थन किया था. पर आपातकाल के बाद वे चुनाव हार गयी थीं. 2004 में कुछ शीर्षक शास्त्रीय नृत्यकारों ने एक अपील जारी कर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को दुबारा सत्तारूढ़ करने की समर्थन किया था. वे भी चुनाव हार गये थे. इसलिए एक सम्भावना तो यह बनती है कि इस बार भी समर्थन की अपील का यही हश्र होगा. यह ख़ामख़याली भी हो सकती है. पर इस निष्कर्ष से बचा नहीं जा सकता कि विरोध तो अकसर सफल होता है और समर्थन प्रायः विफल हो सकता है. शायद इसकी आवृत्ति न हो. पर हम विरोध करनेवालों को यह नैतिक सन्तोष तो होगा ही हमने भारतीय समाज में समरसता भंग करने और घृणा तथा भेदभाव फैलानेवाली शक्तियों का विरोध किया, भले हम उन्हें अपदस्थ कराने में कामयाब नहीं हो सके. किसी भी लेखक के लिए यह नैतिक सन्तोष उसके लोकतांत्रिक अन्तःकरण का सत्यापन है, हार-जीत से अप्रभावित.

आम आदमी का हिंदुस्तान ..!!!

चीजें किस तरह से बदलती हैं, ओर उस मोड़ पर आ जाती हैं, जहां से हमने शुरू किया था, महात्मा गांधी जी जिस हिंदुस्तान की परिकल्पना लिए अफ्रीका से जब भारत आये थे, हम उस दौर में नहीं थे लेकिन इतिहास से काफी सारी जानकारी मिलती है जिससे हम उस दौर को समझ सकें,तो कमोबेश वही स्थिति आज है हिंदुस्तान में, मसलन

गरीबी और बेरोजगारी से त्रस्त जनता, ओर सत्ता के खिलाफ जो आवाज उठाये उसी का दमन, अच्छी शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं, आम आदमी के लिए अच्छे और सस्ते इलाज का कोई इंतजाम नहीं, बिगड़ी हुई न्याय व्यवस्था, उच्च स्तर पर फैला भ्र्ष्टाचार, तानाशाही शासन, जातिगत भेदभाव और भी बहुत सारी समानतायें हैं ।

कहने को तो 75 साल होने को हैं देश को आजाद हुए.. पर हैं वहीं के वहीं..

हां हम उसी भारत में हैं बीते दिनों जिसकी राजधानी दिल्ली में एक ही परिवार की तीन बच्चियां भूख से दम तोड़ देती हैं, दिल दहला देने वाली घटना थी वो ,उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया कि बच्चियों के पेट में कई दिनों से खाने का एक दाना भी नहीं गया था । ओर यहां बात होती है बुलेट ट्रेन की, चुनाव के वक्त जातिवाद, धर्म, पाकिस्तान तक के मुद्दे आ गए लेकिन ये किसी पार्टी के घोषणा पत्र में नहीं था कि हम ऐसी योजना लाएंगे जिससे कोई भूखा नहीं रहेगा।

काहे बोलेंगे ये सब गरीब आदमी तो चन्दा नहीं देता ना चुनाव में पार्टी के लिए, उस के पास तो बिचारे के पास खाली वोट है, उसको एक टाइम का खाना खिला के ओर धर्म की बात करके ले लिया जाएगा वोट ,

कब भारत की जनता ये समझेगी की